“कसाईखाने जा रही गायों को जीवनदान… देवनी की जानकी गौशाला में 250+ गौवंश की सेवा; रोज़ 30 हजार खर्च, फिर भी सेवा जारी!”
“कसाईखाने जा रही गायों को जीवनदान… देवनी की जानकी गौशाला में 250+ गौवंश की सेवा; रोज़ 30 हजार खर्च, फिर भी सेवा जारी!”
बिना सरकारी अनुदान के खड़ी सेवा—रवींद्र महाराज देवणीकर की मानवता को समर्पित जीवन साधना
देवनी (जिला लातूर) के ग्रामीण क्षेत्र में खड़ा एक कार्य आज मानवता का सच्चा अर्थ बता रहा है। रवींद्र महाराज देवणीकर द्वारा स्थापित जानकी गौशाला केवल गायों की देखभाल करने की जगह नहीं है, बल्कि यह सेवा, त्याग और करुणा का जीवंत उदाहरण बन चुकी है। इस गौशाला में वर्तमान में 250 से अधिक गौवंश का पालन-पोषण किया जा रहा है। हर एक गाय के पीछे एक दर्दभरी कहानी छिपी है—कोई दुर्घटनाग्रस्त, कोई बीमार, तो कोई मालिक द्वारा छोड़ दी गई। ऐसे सभी गौवंश को यहाँ नया जीवन मिलता है।इस सेवा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कसाईखाने ले जाई जा रही गायों को बचाने का काम लगातार किया जा रहा है। गौभक्तों की मदद से और न्यायालयीन प्रक्रिया के माध्यम से कई गायों को बचाकर यहाँ लाया जाता है। यही कारण है कि रोज़ाना दो से चार गायों की संख्या बढ़ती जा रही है। मौत के मुंह से वापस लाई गई इन गायों को यहाँ केवल भोजन ही नहीं, बल्कि जीने की नई उम्मीद भी दी जाती है।
“गोमाता के चरणों में अर्पित है जीवन सारा,
उसकी सेवा में ही दिखता है ईश्वर का द्वार…”
इसी भावना के साथ महाराज ने अपना संपूर्ण जीवन इस सेवा को समर्पित कर दिया है।
इस गौशाला का रोज़ का खर्च 30 हजार रुपये से अधिक है। चारा, पानी, दवाइयाँ, उपचार, मजदूर, सफाई—इन सबका बड़ा खर्च उठाना पड़ता है। खास बात यह है कि इस कार्य के लिए कोई भी सरकारी अनुदान प्राप्त नहीं है। इसके बावजूद महाराज अपने प्रयासों और कुछ समाजसेवी संस्थाओं की मदद से इस सेवा को निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं। कई बार आर्थिक कठिनाइयाँ आती हैं, लेकिन सेवा कभी रुकती नहीं।
दिन हो या रात, महाराज का अधिकांश समय गौशाला में ही बीतता है। कोई गाय बीमार हो तो वे उसके पास बैठकर उसकी देखभाल करते हैं। नई आई गायों के डर को दूर कर उन्हें अपने हाथों से खिलाते हैं। इस सेवा में कहीं भी थकान या शिकायत नहीं—सिर्फ समर्पण और ममता दिखाई देती है।
“तिनका देते ही मुस्काए, आँखों में ममता का सागर,
गौसेवा की राह में मिलता है विठ्ठल साकार…”
ये पंक्तियाँ इस गौशाला के हर पल को जीवंत कर देती हैं।
लोकवैभव से बात करते हुए रवींद्र महाराज देवणीकर ने कहा,
“मेरा सब कुछ यही गौवंश है… उनकी सेवा ही मेरा जीवन है। इसी में मुझे सच्चा संतोष मिलता है।” आज के स्वार्थी और तेज़ रफ्तार जीवन में, जहाँ इंसान इंसान के लिए भी नहीं रुकता, वहाँ इस तरह का कार्य समाज को एक नई दिशा देता है। जानकी गौशाला केवल गायों की रक्षा नहीं कर रही, बल्कि मानवता को बचाने का कार्य कर रही है। गाँव के कई युवा इस सेवा में भाग लेकर सहयोग कर रहे हैं। इस कार्य के पीछे न कोई प्रसिद्धि की इच्छा है, न कोई स्वार्थ—सिर्फ एक ही उद्देश्य है,
“गौसेवा ही ईश्वर सेवा है।”
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